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Saturday, September 15, 2012

पोषण आहार तथा पोषक तत्वों की आधारभूत जानकारी

मानव जीवन की तीन महत्वपूर्ण एवं आधारभूत आवश्यकता भोजन, कपड़ा, तथा घर है। इन तीनों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण भोजन है जिसके बिना जीवन संभव नहीं है।

औषधि (दवाई) तथा   श्वाँस  के अतिरिक्त  ग्राह्य वस्तु  जिसके  सेवन से शरीर को पौष्टिक तत्व तथा ऊर्जा मिलती है, भूख मिटती है एवं शरीर पुष्ट एवं स्वस्थ बनता है तथा शरीर का निर्माण होता है, को भोजन कहते है। पीने  योग्य जल को भोजन का भाग ही माना जाता है।
भोजन के कार्य क्या है
1.      भोजन से शरीर को ऊर्जा मिलती है, जिसका उपयोग दैनिक कार्य के संपादन में होता है।
2.      भोजन के द्वारा शरीर को पौष्टिक तत्व प्राप्त होते है, जो शरीर को पुष्ट बनाते है तथा सुरक्षा करते है।
3.      भोजन की मात्रा भूख मिटाती है।
4.      जल के सेवन से घुलनशील पौष्टिक तत्व का शरीर द्वारा उपयोग संभव होता है।
5.      जल के उपयोग से शरीर का तापमान नियंत्रित रहता है।
6.      जल, अषुद्ध तथा अनावष्यक तत्वों के त्याग के द्वारा शारीरिक तंत्र की शुद्धि करता है।
भोजन के पोषक तत्व:
भोजन के पोषक तत्व पाँच प्रकार के होते है जो कि तीन श्रेणियों में विभक्त है। यह निम्नलिखित है: 
इन तत्वों की कमी के कारण शरीर अस्वस्थ हो सकता है अथवा शारीरिक, बौद्धिक अथवा मानसिक विकास बधित (रूक) सकता है। ऐसे तत्व जो भोजन के द्वारा शरीर को ऊर्जा तथा सुरक्षा मिलती है एवं शरीर का निर्माण होता है।
1.      शरीर को ऊर्जा प्रदान करने वाले पौष्टिक तत्व: शरीर को ऊर्जा प्रदान करने वाले पौष्टिक तत्व है कार्बोज़ ( कार्बोहाइड्रेट) एवं वसा।
2.      शरीर का निर्माण करने वाला पौष्टिक तत्व: शरीर का निर्माण करने वाला पौष्टिक तत्व प्रोटीन है।
3.      शरीर को सुरक्षा प्रदान करने वाले पौष्टिक तत्व: शरीर को सुरक्षा प्रदान करने वाले दो पौष्टिक तत्व है: यह है विटामिन एवं खनिज लवण ।
अन्य महत्वपूर्ण तत्व :
उपरोक्त पाँच  पौष्टिक तत्वों के अतिरिक्त दो अन्य तत्व की आवश्यकता भी शरीर को होती है जो कि अत्यधिक महत्वपूर्ण क्रियाशील तत्व है किन्तु यह दोनों तत्व पोषक तत्व की श्रेणी में नहीं रखें जाते है। यह हैं जल एवं रेशा।

Thank You for writing. Please keep in touch. Avtar Meher Baba Ki Jai Dr. Chandrajiit Singh

Wednesday, August 22, 2012

मौसम के अनुसार क़्या खायें

किस मौसम में क्या खाये  तथा क्या दैनिक कार्य करें इस बात की जानकारी पारम्परिक रूप से बुज़ुर्गों ने संग्रहित की है जो अनुभव आधारित है और समय की कसौटी पर कसी हुई है.प्रस्तुत है आपके लिए-
चैते चना वैशाखे बेल, जेठे शयन, अषाढ़े खेल
सावन हर्रे, भादों तिक्त, क्वार मास, गुड़ सेवे नित.
कर्तिक करेला, अगहन तेल , पूसे करे दूध से मेल.
माघ मास घिय-खिच्चड़ खाय, फागुन उठिनित प्रातः नहाय.
इन बारह सों करे मिताई, तो काहे घर वैद्य बुलाई. 


अवतार मेहेर बाबा की जय 

Monday, September 12, 2011

मौसम के अनुसार क्या न खायें (पथ्य)


भारतीय परम्परा के अनुसार आयुर्वेद के सिद्धाँतों के अनुसार पथ्य का अपना महत्व रहा है. चूँकि छ्पाई का विज्ञान बहुत विकसित नहीं था इसलिये पारम्परिक ज्ञान को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को सौंपने के लिये कहावतों और कविताओं का सहारा सफलतापूर्वक लिया गया. एक ऐसी ही महत्वपूर्ण कविता जो हमारे पिता ने हमें लिख के दी, आप के जानने मानने के लिये प्रस्तुत है. इस कविता में, हिन्दी के महीनों के अनुसार, किस माह में क्या नहीं खाना चाहिये इस बात की व्याख्या की गयी है. कविता में एक ही स्थान पर आहार के अतिरिक्त बात कही गयी है स्थान पर कहा गया है-जेठ में पंथ, इसका अर्थ है जेठ के महीने में यात्रा नहीं करना चाहिये.कहीं-कहीं दो बातें कही गईं हैं क्योंकि अलग अलग क्षेत्र में अलग अलग रूप में यह कहावत कही जाती है.
चैते गुड़, बैसाखे तेल
जेठ में पंथ/राई, असाढ़ में बेल
सावन साग/नींबू, न भादौ दही
क्वाँर करेला, कर्तिक मही.
अगहन ज़ीरा, पूस में धना
माघ मसुरिया, फागुन चना.
जो जै चीज़ें जाई बचाई,
उनके घरे वैद न जाई.   

Friday, July 15, 2011

मन संभालें खाने से पहले


खाना बनाते समय, खाना बनने वाले कि मनःस्थिति का सीधा असर बनते हुए खाने और उस खाने को खाने वाले पर पड़ता है. अतः परिवार के सदस्यों की शान्ति और उन्नति के लिए खाना प्रसंन्नातापूर्वक और सेवा भाव से पकाना और परोसना चाहिए.......
रीवा जिले में पदस्थ स्वछता विभाग के प्रमुख श्री संजय पाण्डे के सानिध्य का अवसर खजुराहो जाते हुए प्राप्त हुआ।खाने के प्रभाव के बारे में बात शुरू हुई तो आपने एक वृत्तान्त सुनाया. श्री संजय पण्डे के मित्र की गृहस्थी शांतिपूर्वक चल रही थी।
कुछ दिन बाद, अचानक ही उनके घर में अशांति का माहौल फैलने लगा. इस माहौल से परेशान हो कर उन्होंने अपने गुरु जी से अपनी परेशानी का ज़िक्र किया. तब गुरूजी ने कहा कि घर में जो खाना पकाता है उसकी मनःस्थिति के बारे में पता लगाओ।
इन सज्जन ने घर पर खाना पकाने के लिए एक कुक लगायी थी जिससे पूछने पर पता लगा की रोज़ सुबह वह अपनी पति से झगड़ कर आती थी और इसी मनोदशा में खाना पकाती थी.
गुरूजी के आदेशानुसार इस कुक को पूरी तनख्वाह और इस वादे के साथ कि उसे जब भी कोई ज़रूरत हो तो वह निःसंकोच संपर्क करे, विदा किया गया.
इसके बाद कुछ ही दिनों में आश्चर्यजनक तरीके से घर में फ़िर शान्ति बहाल हो गई.

अमृत का प्याला

राम, कृष्ण, बुद्ध, जोरोस्टर, जीज़स, पैगम्बर मोहम्मद साहेब के बाद इस युग के सातवें और अन्तिम पूर्णावतार, प्रेमावातर, मौनावतार, युगावतार मेहेर बाबा करुना और प्रेम की लीला प्रारम्भ कर चुके हैं। इस अमृत के प्याले को होंठों से लगा लें ......

अवतार मेहेर बाबा

Sunday, November 30, 2008

क्या मन, पकते खाने को प्रभावित कर सकता है


खाना बनाते समय, खाना बनने वाले कि मनःस्थिति का सीधा असर बनते हुए खाने और उस खाने को खाने वाले पर पड़ता है. अतः परिवार के सदस्यों की शान्ति और उन्नति के लिए खाना प्रसंन्नातापूर्वक और सेवा भाव से पकाना और परोसना चाहिए.......


रीवा जिले में पदस्थ स्वछता विभाग के प्रमुख श्री संजय पाण्डे के सानिध्य का अवसर खजुराहो जाते हुए प्राप्त हुआ। खाने के प्रभाव के बारे में बात शुरू हुई तो आपने एक वृत्तान्त सुनाया. श्री संजय पण्डे के मित्र की गृहस्थी शांतिपूर्वक चल रही थी।
कुछ दिन बाद, अचानक ही उनके घर में अशांति का माहौल फैलने लगा. इस माहौल से परेशान हो कर उन्होंने अपने गुरु जी से अपनी परेशानी का ज़िक्र किया. तब गुरूजी ने कहा कि घर में जो खाना पकाता है उसकी मनःस्थिति के बारे में पता लगाओ।
इन सज्जन ने घर पर खाना पकाने के लिए एक कुक लगायी थी जिससे पूछने पर पता लगा की रोज़ सुबह वह अपनी पति से झगड़ कर आती थी और इसी मनोदशा में खाना पकाती थी.
गुरूजी के आदेशानुसार इस कुक को पूरी तनख्वाह और इस वादे के साथ कि उसे जब भी कोई ज़रूरत हो तो वह निःसंकोच संपर्क करे, विदा किया गया.
इसके बाद कुछ ही दिनों में आश्चर्यजनक तरीके से घर में फ़िर शान्ति बहाल हो गई.

Saturday, October 25, 2008

सूर्यास्त से पूर्व भोजन...

सुबह हल्का खाना, दोपहर का खाना भारी फ़िर दस मिनिट का विश्राम और शाम का खाना हल्का और सूर्यास्त के पहले सोने जाने के पहले एक गिलास या एक कप हल्का गुनगुना देसी गाय का दूध सबसे बढ़िया होता है। खासकर शाम का खाना सूर्य अस्त होने के पहले जरूर कर लें। सूर्य की उपस्थिति में ताम्बा सक्रिय रहता है जो खाना पचाने में मदद करता है।

ध्यान है न पाचन दुरुस्त करने के लिए ताम्बे के लोटे में जल ग्रहण करना है
सूर्य की उपस्थित में जठराग्नि प्रबल रहती है पर रात होते ही यह मंद हो जाती है जिससे खाना ठीक ढंग से पच नहीं पाता है। इसलिए बुजुर्ग कहते हैं सूर्य ढलने के पहले खाना हो जाना चाहिए।
पाचन ठीक तो बुद्धि ठीक, बुद्धि ठीक तो मन ठीक, मन ठीक तो ईश्वर कृपा।

Sunday, October 19, 2008

प्रफुल्लित मन से खाना खाएं

बुज़ुर्ग कहते हैं, मन लगा कर खाना खायेंगे तो यह शरीर को लगेगा. पर, मन क्या है???. मन पञ्च ज्ञानेन्द्रियों का स्वामी है. यह हैं चक्षु, घ्राण, रसना, स्पर्श और कर्ण।
चक्षु से आहार की सुन्दरता को देखा जाता है, घ्राण से खाने की खुशबू ली जाती है, रसना से व्यंजनों के ज़ायके का लुत्फ़ लिया जाता है, स्पर्श से आहार के तापमान और तेक्ष्चर का आनंद लिया जाता है और कर्ण से खाने के गुणों का बखान सुना जाता है.

जब इन सभी इद्रियों का ध्यानपूर्वक, पूर्ण उपयोग कर आहार ग्रहण किया जाता है तो इसे प्रफ्फुल्लित मन से भोजन ग्रहण करना कहा जाता है. ऐसी स्थिति में भोजन पचाने के लिए उपयोगी रसायन अपना कार्य भलीभांति कर पाते हैं, और शरीर भोजन और उसकी पौष्टिकता का पूरा लाभ ले पता है. जैसे, खाने की खुशबू से भूख का भड़कना आपने अनुभव किया होगा।

यदि इन इन्द्रियों का ध्यान भोजन से हटा तो भोजन ग्रहण करने और शरीर द्वारा स्वीकार करने में कमी आती है। जिसके फलस्वरूप भोजन का पूरा उपयोग करने में शरीर चूक जाता है. उदहारण स्वरुप यदि टेलिविज़न पर तनावपूर्ण सीरियल देखते हुए भोजन करें, तो स्पर्श को छोड़ कर बाकी चार इन्द्रियां तनाव की स्थिति में कार्य करने लगेंगी, जिससे मन और शरीर तनाव में आ जायेंगे और खाना हजम नहीं हो पायेगा.

इन्द्रियों का सीधा प्रभाव मन पर, मन का प्रभाव शरीर पर, शरीर का प्रभाव स्वस्थ्य और स्वस्थ्य का असर मन पर पड़ता है. यह खाद्य चक्र निरंतर चलता रहता है. इस चक्र को प्रफ्फुल्लित और सुचारू अवस्था में रखना हित कर होता है.

खाते समय सभी इन्द्रियों को भोजन के आलावा अन्य विषयों के समबन्ध में मौन रखना सर्वश्रेष्ठ रहता है. तो खाते समय बात न करना, टेलीविजन न देखना और अन्य विचारों का न आना अच्छा होता है.

Tuesday, October 14, 2008

बुद्धि निर्मल रहेगी तो निर्णय सही होंगे

यदि खाने का समय हमारे शरीर की जैविक घड़ी के अनुसार तय हो पाचन बेहतर ढंग से हो पाता है। हमारी पाचन क्रिया में क्रियाशील पाचक रस, जैविक घड़ी के अनुसार निश्चित समय पर ही उत्सर्जित होते हैं

यदि इस समय पेट में भोजन है तो उसका पाचन प्रारम्भ हो जाएगा। यदि इस समय भोजन अनुपस्थित है तो पाचक अम्ल, एसिडिटी और खट्टी डकारें पैदा करेगी।

समय के बाद जब आहार किया जाएगा तब तक पाचन क्रिया का समय निकल चुका होगा अतः रसों का स्त्राव आवश्यकता अनुसार नही होगा और भोजन ठीक प्रकार से नहीं पच पायेगा और बदहज़मी होगी।

इसलिए खाना तय समय पर ही करें जिससे पाचन की क्रिया सुचारू रूप से पूरी हो सके। भीखम बाबा कहते हैं की पेट साफ़ रहे, क्योंकि पेट साफ़ रहेगा तो बुद्धि निर्मल रहेगी। बुद्धि निर्मल रहेगी तो निर्णय सही होंगे और निर्णय सही होंगे तो सफलता कदम चूमेगी।
शुभकामनायें...

Sunday, October 12, 2008

दूध और दही का लाभ


कैल्शियम खाने को पचाने में मदद करता है और दूध कैल्शियम का बहुत अच्छा स्त्रोत है. इसी लिए बुजुर्गवार खाने के बाद दूध पीने पर ज़ोर देते हैं. यानि हमारे बुजुर्ग जो कहते हैं वह वैज्ञानिक रूप से भी सही है.तो फ़िर आज से खाने के बाद एक कप दूध ज़रूर पियें.




क्या आप को मालूम है की यदि सोने से पहले गुनगुना दूध पिया जाए तो नींद अच्छी आती है. लेकिन यात्रा पर जाने से पहले कभी भी दूध न पियें क्योंकि पेट में तकलीफ हो सकती है.



देश के कुछ हिस्सों में यात्रा से पहले दही खाने का रिवाज़ है. कहते है इससे पाचन ठीक रहता है। दही में लैक्टोबैसिलस बल्गैरिकस नाम का बैक्टीरिया होता है जो पाचन को ठीक रखता है. तो यात्रा पर जाने से पहले दही ज़रूर खाएं, सेहत के लिए यह अच्छा होता है।